व्यक्तित्व : एक बैगन के लिए गुरुजी ने कोल्हान में खड़ा कर दिया था बड़ा आंदोलन
गुरुजी के साथ एक कार्यक्रम में आस्तिक महतो (फाइल फोटो)
Jamshedpur: झारखंड के जन नायक, असाधारण व्यक्तित्व के सर्वमान्य नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के सोमवार को सुबह हुए निधन की खबर से झारखंड आंदोलनकारी एवं झामुमो के वरिष्ठ नेता आस्तिक महतो आहत हैं। उन्होंने कहा कि गुरुजी के निधन से एक युग का अंत हो गया। उनकी कमी को पूरा करना असंभव है। गुरुजी ऐसा व्यक्ति थे जो झारखंडी लोगों के साथ थोड़ा भी अन्याय बर्दाश्त नहीं करते थे। गुरुजी का सबसे पहला और बड़ा आंदोलन की कहानी भी रोचक है जब एक बैगन के लिए राजनगर में विशाल आंदोलन खड़ा कर दिया था। मामला सिर्फ एक बैगन का नहीं था बल्कि उस बैगन को एक व्यक्ति से रंगदारी पूर्वक लूटकर उल्टे उनके खिलाफ जुल्म करने को लेकर था।

आस्तिक महतो ने गुरुजी के साथ आंदोलन की कुछ घटनाओं को साझा करते हुए कहा कि राजनगर में 1985 में एक घटना हुई थी। गांव का एक किसान (साधारण व्यक्ति) अपने खेत से बैगन लाया था बाजार में बेचने के लिए। किसान की टोकरी से उस वक्त एक बड़ा बैगन उठाकर वहां के एक पुलिस अधिकारी जाने लगे, जब किसान ने उनसे पैसे की मांग की तो उसे पैसे देने की बजाय गाली-गलौज करते हुए जोरदार एक तमाचा जड़ दिया।

इसके बाद पीड़ित किसान ने स्थानीय झामुमो कार्यकर्ता के पास जाकर रोते हुए इसकी जानकारी दी। फिर कार्यकर्ता ने यह सूचना निर्मल दा के माध्यम से गुरुजी तक पहुंचाई। तब गुरुजी आग बबूला हो गए और बोकारो से ही निर्मल दा को निर्देश दिया कि निर्मल बाबू आप इस मुद्दे पर आंदोलन करें, हम सूरज मंडल के साथ आ रहे हैं। थाना को ही उखाड़ फेंकेंगे। फिर पहली बार राजनगर में स्थानीय झामुमो नेता व कार्यकर्ताओं के साथ हजारों की संख्या में लोगों ने विशाल प्रदर्शन करते हुए थाने का घेराव किया। इसमें गुरुजी, निर्मल दा, सूरज मंडल आदि प्रमुख थे। इस विशाल आंदोलन के बाद आरोपी पुलिस अधिकारी ने पीड़ित किसान से माफी मांगी और उसे कोल्हान से ही ट्रांसफर करवा दिया गया।

गुरुजी का व्यक्तित्व असाधारण था इसलिए वे एक छोटे से मामले में भी आंदोलन में कूद पड़ते थे। गुरुजी का कहना था कि हमारा आंदोलन ही झारखंडी समुदाय के लोगों को शोषण, उत्पीड़न, अन्याय व अत्याचार से मुक्त कराने का है। इसलिए कहीं भी अगर किसी भी गरीब, शोषित, वंचित, आदिवासी, दलित, मूलवासी के खिलाफ कोई दबंगई करता है तो उसका मुंहतोड़ जवाब देना होगा। इसके बाद कोल्हान में झामुमो का संगठन मजबूत होता चला गया और लोगों का विश्वास बढ़ता गया। आस्तिक महतो के अनुसार इसके बाद चांडिल डैम के विस्थापितों की लड़ाई तेज होने लगी और गुरुजी अक्सर जमशेदपुर आने पर उनके घर में प्रवास करने लगे और आंदोलन की रणनीति बनाने लगे।
आंदोलन के लिए गाड़ी मिलने पर आस्तिक की मां से मिलकर गुरुजी ने लिया था आशीर्वाद
आस्तिक महतो बताते हैं कि 1980 में जब झारखंड आंदोलन के दौरान मेरी मां ने अपनी जमीन बेचकर निर्मल दा को एक गाड़ी खरीदकर दी और इसकी जानकारी गुरुजी को मिली तो उन्होंने निर्मल दा से बोकारो में पूछा कि निर्मल बाबू नई गाड़ी कब खरीदे ? निर्मल दा ने जवाब दिया था कि गुरुजी यह गाड़ी हमारे जमशेदपुर के एक महतो परिवार से मिली है। तब निर्मल दा ने मुझे गुरुजी से मिलाया तो इस खबर से वे काफी खुश हुए और कहने लगे कि अरे जमशेदपुर में भी ऐसा महतो परिवार है ? हमारे आंदोलन को गति देने के लिए गाड़ी खरीदकर दी है, मुझे तो इनकी माताजी से मिलकर आशीर्वाद लेना है। इसके बाद गुरुजी जमशेदपुर स्थित हमारे घर आकर मेरी मां से मिले और आशीर्वाद लिया।
उन्होंने बताया कि गुरुजी ने कहा था कि हमें झारखंड आंदोलन के लिए आपने बड़ा सहयोग दिया और जमशेदपुर में एक घर मिला, यहां से हमारे आंदोलन को धार मिलेगा।

निर्मल दा की शहादत के बाद बाबू को बताने लगे दूसरा निर्मल
‘बाबू भाई’ के नाम से प्रसिद्ध आस्तिक महतो का कहना है कि निर्मल दा की शहादत के बाद 1990 के आसपास कोल्हान में जब नेतृत्वकर्ता की कमी महसूस होने लगी तो किसी भी समस्या पर गुरुजी सीधे उनके पास लोगों को भेज देते थे।
एक बार की कहानी है जब टेलीफोन की सुविधा नहीं थी, गुरुजी विधायक थे और पटना विधानसभा पहुंचे हुए थे तो किसी समस्या को लेकर जमशेदपुर से दुलाल भुईयां उनसे मिलने के लिए पहुंच गए। फिर गुरुजी दुलाल भुईयां को साथ लेकर दूसरे दिन जमशेदपुर लौटे और उनके घर (आस्तिक महतो) आकर कहने लगे कि बाबू दुलाल भुईयां हमारे पार्टी के नेता हैं इनके साथ किसी ने गलत किया है, तुम इसका समाधान कर दो।

गुरुजी ने दुलाल भुईयां से कहा था कि हमारे पास निर्मल महतो नहीं है लेकिन उनका छोटा भाई दूसरा निर्मल के रूप में “बाबू” है न। गुरुजी के आदेश का पालन करते हुए दुलाल भुईयां के मामले में दोनों पक्ष में समझौता करा दिया गया।
गुरुजी ने हमेशा बेटा जैसा सम्मान दिया
आस्तिक महतो बताते हैं कि 1990 तक झामुमो का टिकट उनके जमशेदपुर स्थित घर पर ही फाइनल होता था और उन्हें हमेशा ही याद रहता था कि इस परिवार ने उन्हें ऐसे समय में साथ दिया जब झारखंड मुक्ति मोर्चा को लोग उग्रवादी संगठन मानते थे।





