बारिश में टपकती छत, मंदिर में कटती रात: रवि कालिंदी की बेबसी ने खोली आवास योजनाओं की सच्चाई
Jamshedpur: राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हर गरीब परिवार को पक्की छत देने के उद्देश्य से पीएम आवास योजना के साथ राज्य प्रायोजित अबुआ आवास योजना की शुरुआत की थी। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आ रही है। पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा प्रखंड में योजनाओं के लाभुक चयन और क्रियान्वयन में गंभीर अनियमितताएं सामने आ रही हैं, जिनका सबसे मार्मिक उदाहरण लावा पंचायत के दुआरीडीह गांव निवासी करीब 52 वर्षीय रवि कालिंदी का परिवार है।
रवि कालिंदी वर्षों से अपनी पत्नी और 6 बच्चों के साथ एक जर्जर झोपड़ीनुमा घर में जीवन बिताने को मजबूर हैं। उनका घर ऐसा है कि बारिश होते ही छत टपकने लगती है, दीवारें भीग जाती हैं और पूरा घर रहने लायक नहीं रह जाता। हालिया बारिश में स्थिति इतनी खराब हो गई कि परिवार को अपना घर छोड़कर दूसरों के घरों और गांव के हरि मंदिर में शरण लेनी पड़ी। उनके बच्चों की रातें कभी मंदिर तो कभी स्कूल या आंगनबाड़ी केंद्र के बाहर बीतती हैं।
सिर्फ बारिश ही नहीं, ठंड के दिनों में भी यह परिवार भारी मुश्किलों का सामना करता है। जब पक्के मकानों में रहने वाले लोग भी शीतलहर से परेशान रहते हैं, तब रवि कालिंदी के परिवार की स्थिति और भी भयावह हो जाती है। बावजूद इसके, कई बार आवेदन करने के बाद भी उन्हें किसी भी आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका है।
रवि कालिंदी गांव के डाकुआ हैं, जो हर घर तक सूचना पहुंचाने का काम करते हैं। उनके पास अपनी खतियानी जमीन भी है, फिर भी वे योजना से वंचित हैं। परिवार की जीविका मजदूरी पर निर्भर है, जबकि उनका बड़ा बेटा दूसरे राज्य में काम करता है। गांव के समाजसेवी शेख सनोज बताते हैं कि डाकुआ के रूप में रवि कालिंदी को हर साल 5 से 7 किलो धान प्रति परिवार से मिलता है, जो उनके जीवन का एक बड़ा सहारा है।
स्थानीय स्तर पर भी इस मामले को लेकर चिंता जताई जा रही है। पंचायत के मुखिया कानूराम बेसरा के अनुसार, गांव के अन्य कालिंदी परिवारों को योजना का लाभ मिल चुका है, ऐसे में रवि कालिंदी का नाम छूटना जांच का विषय है और उन्हें जल्द योजना से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। वहीं समाजसेवी शेख सनोज ने भी इस मुद्दे को विधायक तक पहुंचाने की बात कही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां एक ही परिवार को एक से अधिक बार आवास योजना का लाभ मिल चुका है—कहीं पति के नाम पर तो कहीं पत्नी के नाम पर। इसके उलट, अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले रवि कालिंदी जैसे वास्तविक जरूरतमंद आज भी छत के लिए तरस रहे हैं। यह पूरा मामला न सिर्फ योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जिम्मेदारों की लापरवाही किस तरह गरीबों को उनके बुनियादी अधिकार—एक सुरक्षित छत—से वंचित कर रही है।





