अंगूठा छाप कलाकार के कंठ में बसते हैं 200 से अधिक लोकगीत, पटमदा की लोककला को दे रहे पहचान

Patamda: शिक्षा के अभाव को अक्सर प्रतिभा की राह में बाधा माना जाता है, लेकिन पटमदा के आगुईडांगरा निवासी करीब 38 वर्षीय लोक कलाकार सूर्यकांत दास इस सोच को गलत साबित कर रहे हैं। वे भले ही निरक्षर हैं और अपना नाम लिखने के बजाय अंगूठे का निशान लगाते हैं, लेकिन उनके कंठ में दो सौ से अधिक लोकगीतों का खजाना सुरक्षित है। धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों में अपनी गायकी के माध्यम से वे लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ क्षेत्र की लोक परंपराओं को भी जीवंत बनाए हुए हैं।
सूर्यकांत दास विभिन्न धार्मिक आयोजनों, सामाजिक कार्यक्रमों एवं सांस्कृतिक अवसरों पर लोकगीत प्रस्तुत करते हैं।
शुक्रवार को सार्वजनिक गणेश पूजा के मौके पर बेलटांड़ में आयोजित बाउल संगीत कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत के क्रम में लोक कलाकारों को प्रोत्साहन एवं लोक कलाओं के संरक्षण की आवश्यकता बताई। कोल्हान प्रमंडल के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में भी वे अपनी टीम के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं। स्थानीय स्तर पर भले ही उन्हें छोटा कलाकार माना जाता हो, लेकिन उनकी कला और लोकप्रियता का दायरा काफी विस्तृत है। सूर्यकांत स्वयं विभिन्न क्षेत्रों के लोक कलाकारों को जोड़कर अपनी टीम तैयार करते हैं और अलग-अलग अवसरों के अनुरूप कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। उनके गीतों में ग्रामीण जीवन, सामाजिक परंपराओं, धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
युवा समाजसेवी विश्वनाथ महतो बताते हैं कि सूर्यकांत दास पटमदा और बोड़ाम क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम हैं। उनके भीतर छिपी प्रतिभा को उचित सम्मान और मंच मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में ऐसे कई लोक कलाकार हैं, जिनकी प्रतिभा संसाधनों और प्रोत्साहन के अभाव में लोगों के सामने नहीं आ पा रही है। विश्वनाथ महतो ने बोड़ाम प्रखंड के बड़ासुसनी निवासी रहे दिवंगत नेत्रहीन लोक कलाकार भुड़कु गोप का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भुड़कु गोप भी निरक्षर होने के बावजूद अत्यंत प्रतिभाशाली कलाकार थे। उनके पास धर्मग्रंथों और धार्मिक परंपराओं पर आधारित सैकड़ों लोकगीतों का संग्रह था। पिछले वर्ष उनके असामयिक निधन से क्षेत्र की लोककला को अपूरणीय क्षति हुई। उन्होंने कहा कि सरकार और संबंधित संस्थाओं को ग्रामीण क्षेत्रों के लोक कलाकारों की पहचान कर उन्हें मंच, आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि उनकी कला और लोकगीतों की परंपरा संरक्षित रह सके। पटमदा-बोड़ाम क्षेत्र में आज भी कई प्रतिभाशाली कलाकार मौजूद हैं, जिन्हें उचित अवसर और प्रोत्साहन की जरूरत है।



