बोड़ाम में नोटिस के बाद विरोध में उतरे लोगों ने भरी हुंकार, उपायुक्त का आश्वासन: बरसात में नहीं उजाड़ा जाएगा घर

यह केवल जमीन नहीं बल्कि अस्तित्व और पहचान का सवाल है: सुखलाल पहाड़िया
Jamshedpur: बोड़ाम थाना क्षेत्र अंतर्गत बोंटा पंचायत के ग्रामीणों को वन विभाग की ओर से जमीन खाली करने की नोटिस जारी करने के बाद आक्रोशित लोगों ने दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच (कोल्हान) के नेतृत्व में मंगलवार को उपायुक्त कार्यालय, जमशेदपुर के समक्ष एक विशाल जनविरोध प्रदर्शन आयोजित किया। यह प्रदर्शन दलमा क्षेत्र को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने के नाम पर आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों को उनकी पुश्तैनी ज़मीन से बेदखल करने, उनके घरों को ध्वस्त करने और वनाधिकार कानून को दरकिनार करने की सरकारी साजिशों के खिलाफ था। इसमें पटमदा, चांडिल, बोड़ाम, डिमना, पारडीह, गालूडीह, घाटशिला व मुसाबनी सहित कोल्हान के दूर-दराज के इलाकों से हज़ारों की संख्या में ग्रामीण आमबागान मैदान में एकत्र हुए। वहां से प्रदर्शनकारी नारेबाजी के साथ उपायुक्त कार्यालय तक पैदल मार्च करते हुए पहुंचे। इसमें महिलाओं की भी विशेष भागीदारी रही। महिलाएं हाथों में बैनर और तख्तियां लिए हुए जोरदार नारेबाजी की। मौके पर वन अधिकार कानून का बहाना बंद करो, इको-सेंसिटिव जोन के नाम पर उजाड़ना बंद करो, वन क्षेत्र में रह रहे लोगों को सामुदायिक और व्यक्तिगत वन पट्टा दो, के नारे भी बुलंद किए गए। महिलाओं के चेहरों पर दशकों का दर्द और अपने अधिकारों की रक्षा का दृढ़ संकल्प साफ़ दिखाई दे रहा था। प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब वे वर्षों से रह रहे जमीन पर व्यक्तिगत पट्टा के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें पट्टा नहीं दिया जाता। बल्कि उन्हें बार-बार दौड़ाया जाता है और जिस ज़मीन पर वे वास्तव में रहते हैं, उसका अधिकार नहीं दिया जाता। दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच के केंद्रीय अध्यक्ष सुखलाल पहाड़िया ने भावुक होकर कहा कि हम इसी जंगल में जन्मे हैं। हमारे पूर्वज पीढ़ियों से यहीं रहे हैं। अब हमसे हमारी ही ज़मीन के लिए कागज़ मांगा जा रहा है। यह केवल ज़मीन का नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व और पहचान का सवाल है।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें:
इको-सेंसिटिव ज़ोन के नाम पर पारंपरिक निवासों को उजाड़ने की कार्रवाई तत्काल रोकी जाए। किसी भी निर्णय से पहले संबंधित ग्रामसभाओं की पूर्व सहमति अनिवार्य हो। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों की अधिस्वीकृति की प्रक्रिया पारदर्शिता से पूर्ण की जाए।विस्थापन नहीं, परंपरागत अधिकारों की स्थायी गारंटी दी जाए। पूरे मामले की न्यायिक जांच हो और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। प्रदर्शन के बाद एक प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त, जमशेदपुर से मुलाक़ात की। उपायुक्त ने आश्वासन दिया कि बारिश के मौसम में किसी का घर नहीं उजाड़ा जाएगा, और वे वन विभाग से बात कर इस विषय का समाधान निकालेंगे। प्रतिनिधियों ने उपायुक्त से रांची के इको-सेंसिटिव जोन के प्रमुख अधिकारी से बातचीत की और यह पूछा कि इको-सेंसिटिव जोन में वन अधिकार कानून के तहत बन पट्टा दिए जाने का प्रावधान है या नहीं? उन्होंने यह भी उठाया कि खड़िया, पहाड़िया, बिरहोर, सबर जैसे आदिवासी समुदाय इस भूमि के पारंपरिक स्वामी हैं – इन्हें उजाड़ा नहीं जा सकता। उपायुक्त ने कहा कि वे वन विभाग के अधिकारियों से बात कर ठोस हल निकालने की दिशा में कदम उठाएंगे।
प्रदर्शन कार्यक्रम में सहयोगी संगठन के रूप में झारखंड ग्राम सभा सुरक्षा मंच (राज्य स्तर), आदिवासी भूमिज मुण्डा युवा संगठन, कोल्हान, आदिवासी सम्प्रभुता समिति, चांडिल अनुमंडल, स्वराज सोशियो इकनॉमिक एंड रिसर्च सेंटर, झारखंड जनतांत्रिक महासभा, आदिवासी जन मंच, बिरसा सेना, कोल्हान शक्ति पश्चिम सिंहभूम आदि का सहयोग रहा। कार्यक्रम में सुखलाल पहाड़िया, बबिता कच्छप, प्रसुन भील, राधेश्याम सिंह मुण्डा, रविन्द्र सिंह सरदार, डेमका सोय, कृष्णा लोहार, दीपक रंजीत, अजीत तिर्की, दिनकर कच्छप, सूर्यनारायण मुर्मू, जागरण पाल, काकुली महतो, हरमोहन महतो, सुनील हेम्ब्रम, कमल पहाड़िया, रवि पहाड़िया, मंटू पहाड़िया, जयनाथ भूमिज सहित दर्जनों सक्रिय कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।





