प्रफुल्ल बाबू के शिक्षा क्षेत्र के योगदान को पीढ़ियों तक पहुंचाने का होगा प्रयास : चंद्रशेखर टुडू
पटमदा डिग्री कॉलेज में 13वीं पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में दी गई श्रद्धांजलि, मूर्ति स्थापना व जीवनी प्रकाशन की घोषणा
Patamda: स्वर्गीय प्रफुल्ल कुमार महतो की 13वीं पुण्यतिथि के अवसर पर पटमदा डिग्री कॉलेज जाल्ला परिसर में श्रद्धांजलि सभा आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में विधायक प्रतिनिधि सह कॉलेज के सचिव चंद्रशेखर टुडू ने कहा कि स्वर्गीय प्रफुल्ल कुमार महतो एक महापुरुष थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनके संघर्ष और योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आने वाली पीढ़ियां भी उनके योगदान से परिचित हों, इसके लिए कॉलेज परिसर में विधायक मंगल कालिंदी के सहयोग से उनकी प्रतिमा स्थापित करने तथा उनकी जीवनी और इतिहास को प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा। चंद्रशेखर टुडू ने कहा, “आज मैं जो कुछ भी हूं, प्रफुल्ल बाबू की बदौलत हूं।” उन्होंने अपने जीवन का प्रसंग साझा करते हुए कहा कि मैट्रिक पास करने के बाद वे गांव में पारा शिक्षक के रूप में सेवा दे रहे थे। प्रफुल्ल कुमार महतो की सलाह पर उन्होंने इंटर में दाखिला लिया और आगे की पढ़ाई जारी रखी। आज उन्होंने बीएड और एलएलबी की डिग्री हासिल की है। उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल बाबू ने सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीण एवं सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा का जो अलख जगाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल बाबू के शिक्षा संबंधी सपनों को संवारने और आगे बढ़ाने की दिशा में लगातार काम करने की जरूरत है। यह उनका सौभाग्य है कि उन्हें इस जिम्मेदारी का हिस्सा बनने का अवसर मिला है। विधायक मंगल कालिंदी के साथ मिलकर क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को घर के नजदीक बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कई विद्यालयों को प्लस टू में उत्क्रमित कराया गया है। डिग्री कॉलेज के सरकारीकरण के लिए भी प्रयास जारी है। कॉलेज का नैक से मूल्यांकन और ग्रेडिंग भी कराया गया है। चंद्रशेखर टुडू ने कहा कि क्षेत्र में शिक्षा की चर्चा स्वर्गीय प्रफुल्ल कुमार महतो के नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती। उनके सपनों को साकार करने के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कॉलेज की ओर से वर्ष में दो बार रक्तदान शिविर आयोजित किया जाता है, जिसके माध्यम से जरूरतमंद मरीजों को रक्त उपलब्ध कराने का कार्य भी किया जा रहा है। क्योंकि वह शिक्षा के साथ ही सामाजिक कार्यों में रुचि रखते थे।
इतिहास कभी पुराना नहीं होता है: विश्वनाथ सिंह सरदार

इंटर कॉलेज के सचिव विश्वनाथ सिंह सरदार ने कहा कि देह परिवर्तनशील है, लेकिन इतिहास रचने वाले महापुरुष कभी मरते नहीं हैं। स्वर्गीय प्रफुल्ल कुमार महतो का जीवन और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। इतिहास कभी पुराना नहीं होता है और प्रफुल्ल बाबू का योगदान भी इतिहास के पन्नों में सदैव जीवित रहेगा। उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल कुमार महतो का जीवन अभाव, गरीबी, कष्ट और कठिनाइयों से भरा था। इसके बावजूद शिक्षा के प्रति उनकी लगन और कॉलेज को आगे बढ़ाने का संकल्प कभी कमजोर नहीं हुआ। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने शिक्षा को अपना लक्ष्य बनाया और पूरी निष्ठा एवं समर्पण के साथ काम करते रहे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सूर्य के उदय होने से पूरी पृथ्वी प्रकाशित होती है, उसी प्रकार प्रफुल्ल बाबू ने शिक्षा की रोशनी से इस क्षेत्र को प्रकाशित करने का काम किया। उनका योगदान केवल एक संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने ग्रामीण और वंचित समाज में शिक्षा की अलख जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने कॉलेज परिवार से आग्रह किया कि आने वाले दिनों में संस्था में स्नातकोत्तर (पीजी) और बीएड जैसे पाठ्यक्रम शुरू हों तथा कॉलेज निरंतर प्रगति करे। उन्होंने कहा कि इससे क्षेत्र के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। विश्वनाथ सिंह सरदार ने यह भी कहा कि उन्होंने पूर्व में भी आग्रह किया था कि कॉलेज परिसर में प्रफुल्ल कुमार महतो की मूर्ति स्थापित करने के लिए। उन्होंने घोषणा किया कि अगले साल से कॉलेज के प्रॉस्पेक्टस के मुख्य पृष्ठ पर उनकी संक्षिप्त जीवनी अंकित की जाएगी।
प्रफुल्ल बाबू में सपने को हकीकत में बदलने का था गुण : डॉ. तरुण

इंटर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. तरुण कुमार महतो ने कहा कि महापुरुष बनने के लिए सबसे पहले बड़ा सपना देखना पड़ता है और उस सपने को साकार करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना पड़ता है। प्रफुल्ल बाबू ने भी ऐसा ही सपना देखा था। उन्हें भलीभांति पता था कि सपने को हकीकत में कैसे बदला जाता है। यही कारण है कि उन्होंने क्षेत्र के शिक्षा प्रेमियों को एकजुट किया और अपने संकल्प को साकार करने में सफलता हासिल की। महान व्यक्तित्व विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते, बल्कि अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहते हैं। प्रफुल्ल बाबू का जीवन इसी दृढ़ इच्छाशक्ति और समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेज में मूर्ति स्थापना के स्थापना के साथ ही उनकी संक्षिप्त जीवनी का शिलालेख लगाया जाए।
मानव संसाधन देश की राष्ट्रीय संपत्ति, स्वास्थ्य और शिक्षा पर दें विशेष ध्यान : डॉ. राजेंद्र कुमार दास

पटमदा के अंचलाधिकारी डॉ. राजेंद्र कुमार दास ने प्रफुल्ल बाबू की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित रक्तदान शिविर की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन समाजसेवा के साथ-साथ मानवता की मिसाल भी हैं। उन्होंने कहा कि मानव संसाधन किसी भी देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय संपत्ति होती है। इसलिए लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत जनसंख्या के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है और जल्द ही पहले स्थान पर पहुंच जाएगा, लेकिन खेल प्रतियोगिताओं में देश अभी भी अपेक्षाकृत पीछे है। इसका एक प्रमुख कारण लोगों को पर्याप्त एवं संतुलित पोषण नहीं मिल पाना भी है। उन्होंने खान-पान और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. दास ने कहा कि खाद एवं रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग भी स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हो सकता है। गांवों का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां लोगों को शिक्षा और जागरूकता की प्रेरणा मिले। उन्होंने नशापान और रूढ़िवादी सोच को त्यागकर स्वस्थ एवं जागरूक समाज के निर्माण की अपील की।
प्रफुल्ल बाबू की जीवनी को पुस्तक रूप में सामने लाने की जरूरत : पंचानन दास

इंटर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य पंचानन दास ने कहा कि प्रफुल्ल बाबू ने शिक्षा रूपी जिस वटवृक्ष को तैयार किया, उसकी शुरुआत उस भूमि से हुई, जो कभी मरुभूमि जैसी थी। आज उसी स्थान पर शिक्षा का विशाल केंद्र खड़ा होना उनके संघर्ष, संकल्प और दूरदृष्टि का परिणाम है। वे न केवल शिक्षाप्रेमी थे, बल्कि संस्कारी व्यक्तित्व के धनी भी थे। उनसे मिले संस्कार आज एक बड़ी उपलब्धि के रूप में समाज के सामने दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल बाबू की शिक्षा के प्रति गहरी रुचि के साथ-साथ प्रकृति से भी विशेष लगाव था। उनका जीवन संघर्ष, सेवा और समाज के प्रति समर्पण की प्रेरणादायक मिसाल है। ऐसे महान व्यक्तित्व के जीवन और कार्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए उनकी जीवनी पर एक पुस्तक लिखे जाने की आवश्यकता है। पंचानन दास ने कहा कि जिस तरह दशरथ मांझी के संघर्ष और जीवनी को लिखित रूप में सामने लाकर लोगों को प्रेरणा दी गई, उसी प्रकार प्रफुल्ल बाबू के जीवन संघर्ष और योगदान को भी पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा ले सकें।
दादा ने पटमदा को दी नई दिशा, लोगों के दिलों में आज भी जीवित हैं उनकी स्मृतियां : आदित्य
प्रफुल्ल कुमार महतो के अनुज आदित्य महतो ने कहा कि पटमदा ने असमय अपने एक अगुआ को खो दिया। हालांकि यह खुशी की बात है कि क्षेत्र के लोगों ने प्रफुल्ल दा को अपने दिलों में आज भी जीवित रखा है। उनके निधन के 13 वर्ष बाद भी कॉलेज में उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाना उनके प्रति लोगों के सम्मान और जुड़ाव को दर्शाता है। कॉलेज के निर्माण के लिए बहुमूल्य जमीन दान करने वाले ग्रामीणों एवं अन्य सहयोगियों के प्रति भी उन्होंने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग और त्याग से ही क्षेत्र में शिक्षा का यह केंद्र स्थापित हो सका।
आरोपों के बावजूद लक्ष्य से नहीं डिगे : अरुण कुमार
इंटर कॉलेज के प्राचार्य अरुण कुमार ने कहा कि 22 सितंबर 1984 पटमदा एवं बोड़ाम प्रखंड क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दिन था। उस समय मैट्रिक के बाद विशेषकर छात्राओं के लिए उच्च शिक्षा की संभावनाएं लगभग समाप्त हो जाती थीं। आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के कुछ बच्चे ही जमशेदपुर या रांची जाकर आगे की पढ़ाई कर पाते थे। इसी कमी को दूर करने का संकल्प स्वर्गीय प्रफुल्ल कुमार महतो ने लिया। उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल बाबू ने स्वयं काफी संघर्षों के बीच शिक्षा हासिल की थी। अपने व्यक्तिगत अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में उच्च शिक्षा की व्यवस्था विकसित करने का बीड़ा उठाया। पुरुलिया के विक्टोरिया कॉलेज की सरकारी नौकरी छोड़कर जमशेदपुर में वकालत के दौरान उन्होंने मृत्युंजय महतो के साथ इस विषय पर चर्चा की और कॉलेज स्थापित करने का संकल्प लिया। अरुण कुमार ने बताया कि प्रफुल्ल बाबू जमशेदपुर से पटमदा आकर रात-रातभर विभिन्न गांवों में बैठकें करते थे। उन्होंने ग्रामीणों और क्षेत्र के बुद्धिजीवियों को साथ लेकर कॉलेज निर्माण की पूरी योजना तैयार की। लंबे संघर्ष और सामूहिक प्रयास के बाद 5 फरवरी 1984 को पटमदा मध्य विद्यालय में कॉलेज गठन का निर्णय लिया गया। शुरुआत में इसकी स्थापना पटमदा कॉलेज, जाल्ला के नाम से हुई, जो कालांतर में इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने कहा कि कॉलेज निर्माण के दौरान प्रफुल्ल बाबू पर कई तरह के लांछन भी लगाए गए, लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अपने लक्ष्य के प्रति पूरी निष्ठा से जुटे रहे। उनके सूचना आयुक्त बनने के बाद कॉलेज के विकास का स्वर्णिम दौर शुरू हुआ। उनके प्रयासों से दोनों कॉलेजों को स्थायी प्रस्वीकृति दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली। वर्ष 2010 में इंटर कॉलेज को स्थायी प्रस्वीकृति मिली। उन्होंने कहा कि पटमदा और बोड़ाम क्षेत्र में उच्च शिक्षा की नींव मजबूत करने में प्रफुल्ल बाबू का योगदान अविस्मरणीय है। 2 सितंबर 2013 को उनका असामयिक निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा खड़ी की गई शिक्षा की यह विरासत आज भी जीवंत है। प्राचार्य अरुण कुमार ने कहा कि प्रफुल्ल बाबू के संघर्ष और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। पटमदा एवं बोड़ाम क्षेत्र के लिए वे किसी महापुरुष से कम नहीं थे। उनके संघर्षों को जानने और समझने से ही आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल बाबू की विरासत के रूप में तैयार इस कॉलेज को और आगे ले जाने के लिए सामूहिक रूप से चिंतन-मंथन करने की आवश्यकता है। उनके सपनों और संघर्षों को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अध्यक्षता करते हुए डिग्री कॉलेज के प्राचार्य कृष्णपद महतो ने संक्षिप्त में कहा कि प्रफुल्ल बाबू के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। आज पटमदा एवं बोड़ाम के अलावा पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में भी हजारों लोग ऐसे मिलेंगे जो प्रफुल्ल बाबू द्वारा खड़े किए गए इस संस्थान से उच्च शिक्षा हासिल कर चुके हैं।



