मजदूरों की कमी के बीच बदला खेती का तरीका, पटमदा में ठेके पर धान रोपनी कर रहीं महिलाएं
Patamda: कृषि प्रधान पटमदा और बोड़ाम प्रखंड में धान रोपनी का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। लगातार मजदूरों की कमी और समय पर खेती पूरी करने की चुनौती के कारण अब किसान पारंपरिक दैनिक मजदूरी के बजाय महिलाओं से ठेके पर धान रोपनी करा रहे हैं। इस व्यवस्था से किसान और महिला मजदूर, दोनों को फायदा हो रहा है। क्षेत्र में सामान्य हाजिरी मजदूरी 200 से 250 रुपए प्रतिदिन है। किसानों का कहना है कि दैनिक मजदूरी पर काम की गति और गुणवत्ता को लेकर अक्सर शिकायत रहती है, वहीं मजदूरों को यह दर कम लगती है। ऐसे में अब लावा, पाथरडीह, झाड़बामनी, बामनी, खेड़ुआ, लोआडीह, जाल्ला, जोड़सा, लच्छीपुर और बांसगढ़ समेत कई गांवों में महिला मजदूर समूह बनाकर ठेके पर धान रोपनी का कार्य कर रही हैं। ठेके पर काम करने वाली महिलाओं को करीब आठ घंटे के कार्य के बदले 350 से 400 रुपए प्रतिदिन तक की मजदूरी मिल रही है। इससे मजदूरों की आय बढ़ी है, वहीं किसानों का काम भी तय समय में पूरा हो जा रहा है। एक और बड़ा बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि पहले महिलाएं 5 से 10 किलोमीटर तक पैदल चलकर धान रोपनी के लिए दूसरे गांवों में जाती थीं। अब किसान स्वयं उनके आने-जाने के लिए वाहन की व्यवस्था कर रहे हैं, जिससे महिलाओं को सुविधा मिलने के साथ समय की भी बचत हो रही है।
पाथरडीह के किसान सह ग्राम प्रधान धरणीधर महतो बताते हैं कि समय के साथ कृषि पद्धति में बड़ा बदलाव आया है। पहले बैल और भैंसों से खेतों की जुताई होती थी, लेकिन अब अधिकांश किसान ट्रैक्टर का उपयोग कर रहे हैं। केवल खेती के भरोसे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होने के कारण किसान भी अन्य रोजगार की ओर बढ़े हैं और पशुपालन आधारित खेती पहले जैसी नहीं रह गई है। उन्होंने कहा कि बारिश के मौसम में समय पर धान रोपनी पूरी करना किसानों की सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। यदि आसपास के खेत पहले रोप दिए जाएं तो ट्रैक्टर के खेत तक पहुंचने में भी दिक्कत होती है। ऐसे में समय बचाने और खेती का काम जल्द पूरा करने के लिए ठेके पर मजदूरों से काम कराना किसानों की मजबूरी के साथ-साथ एक व्यावहारिक विकल्प बन गया है।


