2010 में लिया संकल्प 16 साल बाद हुआ पूरा, करम महाजुटान के बाद फिर चर्चा में अजीत महतो
पुरुलिया के करम मेले में उमड़ी बड़ी भीड़, कुड़मी समाज की मांगों को मुख्यमंत्री के सामने रखा
झामुमो से अलग होने के बाद सामाजिक आंदोलन में सक्रिय हुए अजीत, कुड़माली भाषा और एसटी दर्जे की मांग को बनाया प्रमुख मुद्दा
Jamshedpur : पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के टामना थाना क्षेत्र स्थित कड़ाडीह मैदान में रविवार को आदिवासी कुड़मी समाज के बैनर तले आयोजित करम महाजुटान में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। पश्चिम बंगाल के साथ झारखंड, ओड़िशा और असम से भी कुड़मी समाज के लोगों के शामिल होने का दावा किया गया। आयोजकों के अनुसार करीब 40 हजार करम नृत्य दलों ने भाग लिया। प्रत्येक दल में महिला-पुरुष शामिल थे। कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। पुरुलिया सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो, जमशेदपुर सांसद विद्युत वरण महतो, पश्चिम बंगाल के मंत्री राजेश महतो, झारखंड के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो समेत कई विधायक, पूर्व विधायक और सामाजिक नेता मौजूद रहे। कार्यक्रम में अजीत प्रसाद महतो ने कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने और कुड़मी समाज को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की मांग मुख्यमंत्री के समक्ष रखी। मुख्यमंत्री ने अपने चुनावी संकल्प पत्र में किए गए वादों को पूरा करने का आश्वासन दिया। करम महाजुटान के बाद कोल्हान समेत झारखंड के विभिन्न हिस्सों में अजीत प्रसाद महतो की भूमिका को लेकर चर्चा तेज हुई है। समाज के बीच उन्हें लंबे समय से कुड़मी मुद्दों को लेकर सक्रिय नेता के रूप में देखा जाता रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी वे कुड़मी समाज की मांगों को लेकर सक्रिय रहे थे।
2010 में झामुमो से अलग होने के बाद बदली राह
20 से 22 सितंबर 2010 को दुमका में झामुमो के नौवें केंद्रीय महाधिवेशन के दौरान पद से हटाए जाने के बाद अजीत प्रसाद महतो ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की थी। उनके आंदोलनकारी साथी बोड़ाम निवासी दुर्योधन महतो के अनुसार, उस समय अजीत महतो ने कहा था कि पार्टी को खून-पसीने से सींचने के बावजूद उन्हें पद से हटाया गया है और एक दिन वे अपनी क्षमता साबित करेंगे।
इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक झामुमो (अजीत) के नाम से संगठन चलाया। बाद में बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाले झाविमो और फिर सुदेश महतो के नेतृत्व वाली आजसू पार्टी से जुड़े।
वर्ष 2014 के बाद उन्होंने पूर्वांचल आदिवासी कुड़मी समाज के मुख्य उपदेशक के रूप में सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता बढ़ाई। कुड़मी समाज की विभिन्न मांगों को लेकर जनसभाओं, रैलियों और रेल अवरोध आंदोलनों में उनकी भूमिका रही। इन आंदोलनों के माध्यम से कुड़मी समाज की मांगों को व्यापक स्तर पर उठाया गया। अजीत महतो की सक्रियता और उनके नेतृत्व में हुए आंदोलनों का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में भी मिलता है। अब पुरुलिया के करम महाजुटान में बड़ी भागीदारी और मुख्यमंत्री की मौजूदगी के बीच कुड़मी समाज की मांगों को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद झारखंड के लिए इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
मूलमानता अजीत प्रसाद महतो : पांच दशक का राजनीतिक संघर्ष और जनआंदोलन
Purulia: मानभूम-पुरुलिया की राजनीति और जनआंदोलनों के इतिहास में अजीत प्रसाद महतो का नाम एक ऐसे आंदोलनकारी नेता के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने पांच दशक से अधिक समय तक जनअधिकार, रोजगार, जमीन, भाषा और सांस्कृतिक पहचान के सवालों को राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनाया। आदिवासी कुड़मी समाज में वे ‘मूलमानता’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। पुरुलिया जिले के आड़सा थाना क्षेत्र के अयोध्या पहाड़ की तलहटी में बसे हेटगुगुई गांव में जन्मे अजीत प्रसाद महतो ने छात्र जीवन से ही सामाजिक सरोकारों को अपनी प्राथमिकता बनाया। शिक्षा पूरी करने के बाद उनके सामने नौकरी के अवसर भी आए, लेकिन उन्होंने अपना जीवन सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष के लिए समर्पित करने का रास्ता चुना। अजीत महतो के सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1977 में हुई, जब उन्होंने करीब 500 बेरोजगार युवाओं को एकजुट कर रोजगार के सवाल पर सभा आयोजित की। इसके बाद 1978 में ‘संपूर्ण बंगाल बेरोजगार समिति’ का गठन किया और इसके राज्य महासचिव बने। बेरोजगारी के मुद्दे से शुरू हुआ उनका संघर्ष धीरे-धीरे झारखंड की पहचान और स्थानीय अधिकारों के व्यापक आंदोलन से जुड़ गया। 1979 में वे विनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन और एके राय के नेतृत्व वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़े। संगठन में उन्होंने पुरुलिया जिला युवा सचिव से लेकर जिला अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय उपाध्यक्ष तक की जिम्मेदारियां संभालीं। इस दौरान मानभूम क्षेत्र में वृहद झारखंड की पहचान और अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। अजीत प्रसाद महतो के राजनीतिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा आंदोलनों और जेल यात्राओं से जुड़ा रहा। विभिन्न आंदोलनों के दौरान वे पांच बार जेल गए और कुल 201 दिन कारावास में रहे। बेरोजगारों के रोजगार, शराब विरोधी अभियान, जमीन के सवाल और झारखंड आंदोलन सहित विभिन्न मुद्दों को लेकर उन्होंने संघर्ष किया। 1991 में आंदोलन के दौरान पुलिस की गोलीबारी में घायल होने की घटना भी उनके संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन का हिस्सा रही। जेल में भी उनका आंदोलनकारी तेवर बना रहा। वे वहां ‘जय झारखंड’ लिखकर और तीर-धनुष जैसे प्रतीकों के माध्यम से अपने संघर्ष की भावना को अभिव्यक्त करते रहे।
चुनावी राजनीति में भी सक्रिय
अजीत महतो ने आंदोलन के साथ चुनावी राजनीति में भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक मंचों से कई बार लोकसभा चुनाव लड़ा। बाद के दौर में झामुमो से मतभेद के बाद उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (अजीत), झारखंड विकास मोर्चा और आजसू जैसे राजनीतिक मंचों से भी अपनी गतिविधियां जारी रखीं। उनकी राजनीति का केंद्र सत्ता से अधिक जनमुद्दे रहे। रोजगार, स्थानीय अधिकार, जमीन, भाषा और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषय उनके राजनीतिक संघर्ष में लगातार दिखाई देते हैं।
कुड़मी-कुड़माली आंदोलन का प्रमुख चेहरा
बाद के वर्षों में अजीत प्रसाद महतो कुड़मी-कुड़माली आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए। 2014 के बाद पूर्वांचल आदिवासी कुड़मी समाज के मुख्य उपदेशक के रूप में उन्होंने कुड़मी समाज की विभिन्न मांगों को लेकर व्यापक आंदोलन का नेतृत्व किया। कुड़मी को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने, कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने और सरना धर्म कोड लागू करने की मांगों को लेकर उन्होंने जनसभाओं, रैलियों और रेल टेका (अवरोध) आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इन आंदोलनों के जरिए उन्होंने कुड़मी समाज के सवालों को राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया।



