पटमदा-बोड़ाम में कल से गूंजेंगे अहिरा गीत, पारंपरिक बांदना पर्व की होगी शुरुआत
Patamda : पटमदा और बोड़ाम क्षेत्र में पारंपरिक बांदना पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। कृषि संस्कृति, पशुधन और पूर्वजों की विरासत से जुड़ा यह पर्व ग्रामीण लोकजीवन की विशिष्ट पहचान है। बांदना पर्व की शुरुआत अमावस्या की रात से होती है जबकि समापन तृतीया तिथि को कांटा काढ़ा के साथ होता है। इस दौरान ढोल, मांदर और नगाड़ों की थाप पर झांगड़ टीम गांव-गांव घूमकर गौ माता को जगाती है। अगले दिन गोहाल में गोरोया पूजा कर घी से बने पीठा का भोग लगाया जाता है। इसके बाद महिलाएं गौ माता को चुमाती हैं और विभिन्न अखाड़ों में पारंपरिक बरद खूंटा का आयोजन होता है। पर्व में अहिरा गीतों का विशेष महत्व है। ग्रामीण इसकी तैयारी करीब एक महीने पहले से शुरू कर देते हैं। वहीं, किसान हल, मय और जुआल जैसे कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीये और बर्तनों का भी पर्व में विशेष स्थान है।
कुमीर गांव निवासी किसान सुकुमार महतो और सुनील महतो ने बताया कि किसान कई महीने पहले से इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। पूर्वजों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह से निभाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में बारह महीनों में तेरह पर्व मनाने की परंपरा है, जिनमें बांदना का विशेष महत्व है। वहीं, जेएलकेएम के जिला सचिव राजेश कुंभकार ने क्षेत्रवासियों को बांदना पर्व और दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान, कृषि परंपरा और पूर्वजों की विरासत का प्रतीक है। इसका संरक्षण कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
फोटो: फाइल












