लोकतंत्र की असली ताकत है शांतिपूर्ण असहमति, सत्याग्रह आज भी उतना ही प्रासंगिक : विश्वनाथ
Jamshedpur: सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णय यह स्पष्ट करते हैं कि किसी भी अनशनकारी के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के शांतिपूर्ण विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के अधिकार का हनन किया जाए। यह कहना है युवा समाजसेवी विश्वनाथ महतो का। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अहिंसक एवं शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार प्रदान करता है और यही किसी सशक्त लोकतंत्र की मूल आधारशिला है।
प्रशासन ने भले ही सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से शारीरिक रूप से हटा दिया हो, लेकिन उनके शांतिपूर्ण अनशन और नैतिक प्रतिरोध ने देशभर के नागरिकों, युवाओं और छात्रों के बीच जिस जागरूकता, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक चेतना का संचार किया है, उसे किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई या बल प्रयोग से समाप्त नहीं किया जा सकता। यह आंदोलन एक बार फिर इस सत्य को रेखांकित करता है कि सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस पर आधारित महात्मा गांधी का सत्याग्रह आज भी उतना ही प्रासंगिक, प्रभावशाली और प्रेरणादायक है, जितना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समय था। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, शांतिपूर्ण असहमति और नैतिक प्रतिरोध की परंपरा से जीवंत एवं सशक्त बनता है। ऐसे अहिंसक आंदोलनों का महत्व आज भी उतना ही है, क्योंकि यही लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करते हैं, शासन को जवाबदेह बनाते हैं और समाज में संवैधानिक चेतना को निरंतर सुदृढ़ करते हैं।


